अनुवादक

बुधवार, 9 फ़रवरी 2022

" तीसरी बकरी " कहानी ~ नमः वार्ता

💥🔆 जय श्री राम 💥🔆

 तीसरी बकरी 

हृदय और लक्ष्य बड़े शरारती बच्चे थे, दोनों कक्षा 5 के विद्यार्थी थे और एक साथ ही स्कूल आया-जाया करते थे।

एक दिन जब स्कूल की छुट्टी हो गयी तब लक्ष्य ने हृदय से कहा, “ मित्र, मेरे मस्तिष्क में एक विचार है?”

“बताओ-बताओ…क्या विचार है?”, हृदय ने उत्सुक होते हुए पूछा।

लक्ष्य- “वो देखो, सामने तीन बकरियां चर रही हैं।”

हृदय- “ तो! इनसे हमे क्या लेना-देना है?”

लक्ष्य-” हम आज सबसे अंत में स्कूल से निकलेंगे और जाने से पहले इन बकरियों को पकड़ कर स्कूल में छोड़ देंगे, कल जब स्कूल खुलेगा तब सभी इन्हें खोजने में अपना समय नष्ट करेगे और हमें पढाई नहीं करनी पड़ेगी…”

हृदय- “पर इतनी बड़ी बकरियां खोजना कोई कठिन काम थोड़े ही है, कुछ ही समय में ये मिल जायेंगी और फिर सबकुछ सामान्य हो जाएगा….”

लक्ष्य- “हाहाहा…यही तो बात है, वे बकरियां आसानी से नहीं ढूंढ पायेंगे, बस तुम देखते जाओ मैं क्या करता हूँ!”

इसके बाद दोनों मित्र छुट्टी के बाद भी पढाई के बहाने अपने क्लास में बैठे रहे और जब सभी लोग चले गए तो ये तीनो बकरियों को पकड़ कर क्लास के अन्दर ले आये।

अन्दर लाकर दोनों मित्र ने बकरियों की पीठ पर काले रंग का गोला बना दिया। इसके बाद लक्ष्य बोला, “अब मैं इन बकरियों पे नंबर डाल देता हूँ।, और उसने सफेद रंग से नंबर लिखने शुरू किये-

पहली बकरी पे नंबर 1
दूसरी पे नंबर 2
और तीसरी पे नंबर 4

“ये क्या? तुमने तीसरी बकरी पे नंबर 4 क्यों डाल दिया?”, हृदय ने आश्चर्य से पूछा।

लक्ष्य हंसते हुए बोला, “ मित्र यही तो मेरा आईडिया है, अब कल देखना सभी तीसरी नंबर की बकरी ढूँढने में पूरा दिन निकाल देंगे…और वो कभी मिलेगी ही नहीं…”

अगले दिन दोनों दोस्त समय से कुछ पहले ही स्कूल पहुँच गए।

थोड़ी ही देर में स्कूल के अन्दर बकरियों के होने का शोर मच गया।

कोई चिल्ला रहा था, “ चार बकरियां हैं, पहले, दुसरे और चौथे नंबर की बकरियां तो आसानी से मिल गयीं…बस तीसरे नंबर वाली को ढूँढना बाकी है।”

स्कूल का सारा स्टाफ तीसरे नंबर की बकरी ढूढने में लगा गया…एक-एक क्लास में टीचर गए अच्छे से तलाशी ली। कुछ खोजू वीर स्कूल की छतों पर भी बकरी ढूंढते देखे गए… कई सीनियर बच्चों को भी इस काम में लगा दिया गया।

तीसरी बकरी ढूँढने का बहुत प्रयास किया गया….पर बकरी तब तो मिलती जब वो होती…बकरी तो थी ही नहीं!

आज सभी परेशान थे पर हृदय और लक्ष्य इतने खुश पहले कभी नहीं हुए थे। आज उन्होंने अपनी चालाकी से एक बकरी अदृश्य कर दी थी।

 _इस कहानी को पढ़कर चेहरे पे हलकी सी मुस्कान आना स्वाभाविक है पर इस मुस्कान के साथ-साथ हमें इसमें छिपे सन्देश को भी ज़रूर समझना चाहिए। तीसरी बकरी, वास्तव में वो चीजें हैं जिन्हें खोजने के लिए हम बेचैन हैं पर वो हमें कभी मिलती ही नहीं….क्योंकि वे वास्तव में होती ही नहीं!_ 

_हम ऐसा जीवन चाहते हैं जो सम्पूर्ण रूप से आदर्श हो, जिसमे कोई समस्या ही ना हो…._

_हम ऐसा जीवन साथी चाहते हैं जो हमें पूरी तरह समझे जिसके साथ कभी हमारी अनबन ना हो….._

_हम ऐसी व्यवसाय/नौकरी चाहते हैं, जिसमे हमेशा सबकुछ एकदम सुगम सुचारू चलता रहे…_

_क्या ज़रूरी है कि हर समय किसी वस्तु के लिए परेशान रहा जाए? ये भी तो हो सकता है कि हमारे जीवन में जो कुछ भी है वही हमारे जीवन को परिपूर्ण करने के लिए पर्याप्त हो….ये भी तो हो सकता है कि जिस तीसरी चीज की हम तलाश कर रहे हैं वो हकीकत में हो ही ना….और हम पहले से ही परिपूर्ण हों!--दिनेश बरेजा_

 "वर्तमान"को आनंद से जियो, 
 "भूतकाल" को भूल जाओ, 
 भविष्य को हरिइच्छा पे छोड़ दो। 
इसलिए मैं  सभी से सदा कहता हूं  जो प्राप्त है-पर्याप्त है 




 गांव-देहात में एक कीड़ा पाया जाता है, जिसे गोबरैला कहा जाता है। उसे गाय, भैंसों के ताजे गोबर की दुर्गंध बहुत भाती है! वह सुबह से गोबर की तलाश में निकल पड़ता है और सारा दिन उसे जहां कहीं गोबर मिल जाता है, वहीं उसका गोला बनाना शुरू कर देता है। शाम तक वह एक बड़ा सा गोला बना लेता है। फिर उस गोले को ढ़केलते हुए अपने बिल तक ले जाता है। 

 लेकिन बिल पर पहुंच कर उसे पता चलता है कि गोला तो बहुत बड़ा बन गया मगर उसके बिल का द्वार बहुत छोटा है। बहुत परिश्रम और कोशिशों के बाद भी वह उस गोले को बिल के अंदर नहीं ढ़केल पाता, और उसे वहीं पर छोड़कर बिल में चला जाता है। 

 यही हाल हम मनुष्यों का भी है। पूरी जिंदगी हम दुनियाभर का माल-मत्ता जमा करने में लगे रहते हैं, और जब अंत समय आता है, तो पता चलता है कि ये सब तो साथ नहीं ले जा सकते। और तब हम उस जीवन भर की कमाई को बड़ी हसरत से देखते हुए इस संसार से विदा हो जाते हैं।
प्रेषक-दिनेश बरेजा 

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